साहित्यिक कल्पना --लेखनी प्रतियोगिता -08-Jun-2023
मेरा मानना है कि कल्पना के बिना साहित्य सम्भव ही नहीं है,जब तक आप अपनी कल्पनाशक्ति में कुशल नहीं होगें तब तक आप एक अच्छे साहित्यकार बन ही नहीं सकते,क्योंकि कल्पना करके ही आप अपनी कहानी या कविता की रूपरेखा तैयार कर पाते हैं,आप अपने आस पास के चरित्रों और वातावरण को देखकर ही लिखने की प्रेरणा लेते हैं और इसके लिए आपको कल्पना की आवश्यकता होती है,आप कल्पना करके ही उन चरित्रों के स्वाभाव और अचार-व्यवहार का अनुमान लगा सकते हैं,
कल्पना के विषय में सबसे अनोखी बात यह है कि इसकी एकमात्र सीमा स्वयं कल्पना करने वाला ही तय करता है,प्रकृति अपने आप में एक बहुत ही खूबसूरत कल्पना है, जिसे बनाने वाले ने बहुत ही खूबसूरती से तराशा है और शायद यही कारण है कि प्रकृति ने इंसानो को भी असीमित कल्पनाशक्ति का वरदान दिया है,
हम सबकी कल्पनाओं की अपनी अपनी दुनिया होती है और हो ना हो हम सब कभी ना कभी अपनी कल्पनाओं में जीते हैं, पर अपनी कल्पनाओं को शब्दों के माध्यम से एक खूबसूरत कहानी का रूप कम ही लोग दे पाते हैं और ये आवश्यक भी है, कल्पनाओं की दुनिया अपने मस्तिष्क में गढ़ना कोई आसान काम नहीं, ज़रा सोचकर देखिये सिन्दवाद की कहानियांँ,शेख चिल्ली के रोचक किस्सों के बारे में या फिर किसी भी महान साहित्यकार का कोई भी उपन्यास उठा लें,उसमें आपको कल्पनाएं ही कल्पनाएं भरी पड़ी मिलेगीं,मैनें प्रेमचंद जी का कायाकल्प पढ़ा था जिसका आधार केवल कल्पना ही थी, अगर आप समझने की दृष्टि से देखेंगे तो पाएंगे कि छोट-छोटी सी बारीकियाँ जो आपस में जुड़कर आपको आश्चर्य में डाल देगीं उन बारीकियों को रच पाना सरल कार्य नहीं है, यही कारण है कि साहित्यकारों और कथाकारों को किसी सीधे और स्पष्ट योगदान के बिना भी प्राचीनकाल से ही समाज में एक अलग प्रसिद्धी और सम्मान मिला है,
कहानियों का सदैव से हमारे जीवन में कितना महत्व रहा है, रोचक कहानियाँ लगभग सभी को लुभाती हैं और इसके लिए हर व्यक्ति के लिए अपनी अपनी अलग अलग वज़ह हो सकती है, कुछ काल्पनिक दुनिया हमें इतनी पसंद आती हैं कि हम उनसे बाहर आना ही नहीं चाहते और वे हमें वास्तविकता को भूल जाने के कुछ क्षण प्रदान करती हैं,इसी तरह मैनें अपनी रचना रहस्यमय टापू और चन्द्र-प्रभा लिखी थी,पहले तो ये लगा कि मैं ये क्या लिख रही हूँ लेकिन जब पाठकों को पसंद आई तो अच्छा लगा,
ज्यादातर हम देखते हैं कि कुछ चरित्रों को हम अपने जीवन के बहुत करीब पाते हैं, हम उनमें अपनी या अपने किसी करीबी की झलक देखते हैं या फिर उस चरित्र का व्यक्तित्व हमें इतना प्रभावित करता है कि हमें उसे अपने दिल-ओ-दिमाग़ से निकाल नहीं पाते,अगर हम अपनी पौराणिक कथाओं को भी कहानियों के रूप में देखें तो हम पाएंगे कि वह प्रभावी व्यक्तित्व वाले चरित्र ही हैं जो उन कहानियों को आम साहित्य से अलग करते हैं जैसे कि रामायण और महाभारत और कथाकारों ने उन चरित्रों के व्यक्तित्वों का इतनी सुंदरता से वर्णन किया है कि हम उन चरित्रों को अपने जीवन में एक अलग ही स्थान दे देते हैं,
पर हर लुभावनी कहानी प्रभावी व्यक्तित्वों या रंगीन काल्पनिक दुनियाओं के बारे में हो तो हमेशा ऐसा ज़रूरी नहीं है,विश्व साहित्य में ऐसे बहुत से साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी सादा एवं बहुत ही वास्तविक कहानियों से भी लोगों का दिल जीता है,हिंदी साहित्य में से कुछ नाम लें तो आचार्य चतुरसेन और महाश्वेता देवी जैसे साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी सीधी एवं सरल कहानियों से लोगों के मन को प्रभावित किया है क्योंकि उन्होंने हमारे दिल के उस कोने पर चोट की जो अतिसंवेदनशील है,वे भावनाओं के माध्यम से लोगों से जुड़ पाए,साहित्य और काल्पनिक दुनिया शोध एवं विचार के लिए एक विशाल विषय वस्तु है और हर व्यक्ति की इसके बारे में एक अलग धारणा हो सकती है और शायद यह ही इसकी सुंदरता का कारण है।
कल्पना मानव मस्तिष्क की सृजनशीलता की पहली कड़ी है ये किसी विशेष व्यक्ति या विश्व के किसी विशेष हिस्से तक सीमित न रह कर प्रत्येक मनुष्य के जीवन का अंग भी बनती हैं,इन्द्रियों के सहारे हम जो भी अनुभव करते हैं, वह सबका सब अनुभव इसी ज्ञान का मूल है और यही कल्पना शक्ति साहित्यकारों के लिए भी आवश्यक है,कल्पना और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए कल्पना के बिना साहित्य का सृजन लगभग असम्भव है,,
ज्ञान समाप्त....
सरोज वर्मा.....
Babita patel
09-Jun-2023 03:00 PM
nice
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Abhinav ji
09-Jun-2023 08:47 AM
Very nice 👍
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वानी
08-Jun-2023 07:26 PM
Nice
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